Sunday, 30 December 2012

वो सपने भी टूटे...




शिला मिलना चाहिए, माहौल बदलना चाहिए,
शामिल हर एक पापी को, फ़ाशी पर लटकाना चाहिए ....!!

खुशियाँ भी अनजान थी, वो रात सूनसान थी,
दोस्त था, अरमान था, पर न जाना की वो कुछ पल का महमान था...

साथ भी टूटा , समय का वो पल भी टूटा ..
रात बीती तो अरमान भी टूटा.....

सपने भी टूटे,जज्बात भी टूटे...
टूटे हर वो रिश्ते ....और मेरे अल्फाज भी टूटे..

भारत रोया , जनता रोई..रोया हर अरमान यहाँ...
माँ का वो रिश्ता भी रोया... जिसने पाला २३ साल जहाँ...

सोचा न था , जाना न था, की सपने टूटे आज यहाँ
माँ मुझको तू वादा कर, न बक्शेगी पापी को यहाँ,

माँ तेरे दामन मैं खेल करती थी, और तू मेरे हर पल को रोशन करती थी..
उस रोशनी के नाम पे तूने, दामिनी नाम रखा था.......

पर वो काली रात थी माँ, जिसने इस रोशनी को बुझा दिया...
मेरे हर एक सपने और अरमान को, उन पापियों ने मिटा दिया...

                                                                                   द्वारा :- संदीप शरद
                                                                                     असिस्टेंट मैनेज़र (प्लानिंग - सिविल)
                                                                                     एरा ग्रुप (नॉएडा)
                                                                                     बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर

Tuesday, 6 November 2012

कफ़न ....@@@





कुछ पल के लिए सारे, तेरे रंग समेट लेता हूँ,
याद करता हूँ तुझको, एक कफ़न ओड़ लेता हूँ !
न दर्द हैं जीने में, न याद हैं सीने में
ये कफ़न जमाना हैं, बाकी बरबाद हैं जीने में !
क्या खेल थे वो अपने, बचपन के जमाने में
जब याद किआ उनको, आंसू आ गए आखों में !
ये दर्द का दरिया हैं, दरिया में बहना हैं
अजीब खेल हैं दुनियां, इस कफ़न में रहना हैं !
कुछ खुशियाँ मिलती हैं,कुछ गम भी आते हैं
रात चली जाती , दिन भी आते हैं !
जो सपने हमने देखे, वो सच हो जाते हैं
गरीब थे वो इन्सां, अमीर बन जाते हैं !
मुझे अच्छा लगता हैं, जब मैं ये शब्द बनाता हूँ,
कहते लोग मुझे शायर, पर मैं "दीप" जलाता हूँ !
उज्वल करता इस दुनिया को, आल्फाज जमाना कहता हैं
ये मैं नही कहता, ये कफ़न जमाना कहता हैं,!
कुछ पल के लिए सारे, तेरे रंग समेट लेता हूँ,
याद करता हूँ तुझको, एक कफ़न ओड़ लेता हूँ !

                                                                                     द्वारा :- संदीप शरद
                                                                                     असिस्टेंट मैनेज़र (प्लानिंग - सिविल)
                                                                                     एरा ग्रुप (नॉएडा)  
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Friday, 27 July 2012

गैरो के लिए हमने एक बात कहीं होती....!!



गैरो के लिए हमने एक बात कहीं होती
कुछ दिल से कहा होता कुछ रात कहीं होती
मेरे लिए वो दिल से अरमा वो सजा देती
गर वो प्यार मुझे करती, दुनिया से न वो डरती
अल्फाज को वो दिल से एक ख्वाब बना देती 
गैरो के लिए हमने एक बात कहीं होती
अन्जान समझ बैठी मुझको वो तो ऐसे
वो दूर जा रही हैं बारिश हो फिर वो जैसे
भीगा बदन हैं मेरा, वो नाम ले रहा हैं
लफ्ज हैं जो उसके, वो इंकार कह रहे हैं
जानता था मैं भी, ये प्यार न था मुझसे
मैं प्यार के हवाले रास्ता बना रहा था
वरसों गुजर गए थे, मौसम बदल गए हैं
वो पत्थर की थी मूर्ति, उसे कुछ न याद आया
वो भीगा बदन खड़ा था, फिर न उसे कोई ख्वाब आया
गिरा वो जमीं पर, एक लाश बन गया था
उस मूर्ति सी खड़ी लड़की को न कोई ख्याल आया 
जब पता चला उसे, की वो लाश बन गया हैं
वो पीछे भी न वो पलटी, उसे तो एक नया साथ मिल गया हैं
गैरो के लिए हमने एक बात कहीं होती
कुछ दिल से कहा होता कुछ रात कहीं होती

                                                                            द्वारा :- संदीप शरद
                                                                                        असिस्टेंट मैनेज़र (प्लानिंग - सिविल)
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                                                                                         बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर



Monday, 25 June 2012

बस कल यहीं तू गुमनाम हैं .....@@




मैं भी बैठा रात को ऐसे गुमनामों की अंधियारी में,
सोचा करता दिन भर ऐसे, दुनियां की गलियालो में,
ये प्यार वफ़ा सब धोखा हैं, अंजानो की इस दुनियां में,
यहाँ न कोई अपना हैं, दुनियां के खेल तमाशे में,
जब साथ यहाँ पर देते हो, तब मतलब के बन जाते हो,
ऐ तुम कैसे इन्सां हों, जो ताश का खेल बनाते हो,
हस्ते हो तो हस्ते हो, रोते हो तो खूब रुलाते हो,
तुम तो ऐसे पत्थर हो, जो रेत में धूल बन जाते हो, 
ये तो गुमनामों की अंधियारी में, ऐसा साज उतारा था 
जो बनते थे हुनर में ऐसे, उनको नीचे उतारा था,
मत भूलो ऐ इंशा तू, समय  बड़ा बलवान हैं,
आज तो तू बढ़ता जाता, कल यहीं तू गुमनाम हैं.......बस कल यहीं तू गुमनाम हैं ..!!!

                                                                           

                                                                            द्वारा :- संदीप शरद
                                                                            सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
                                                                             बी . टेक . :- एच. बी. टी. आई. - कानपूर

Monday, 21 May 2012

...........@@ चेहरा @@........



एक मासूम चेहरे पर , एक चेहरा याद आया
जिसे चाहते थे, आज वहीँ याद आया,
न उठा फ़ोन उसका, न वो फ़ोन आया
यादें उसकी, जिसने दिनभर रुलाया,
आंसू जो भी बिखरे , वो मोती बन गए थे
समेटा जब उसको, तो वो नाम याद आया,
यादों में मेरे हर लम्हा याद आया
भुला जो उसको , तो और याद आया,
यादों मैं तनहा, हर लम्हा मर रहा था
बस कश - में - कश में, अपनी जिंदगी जी रहा था,
शायद चाहने लगा था, उसे अपनी ज़ी जान से ज्यादा
पर न जाने क्यों, मुझे डर सा लग रहा था,
मेरे पास आई, वो मेरी बन गई हैं
ऐसा वो मुझको, सपना सा लग रहा था,
आखे खुली, तो देखा था हमने
न कोई कॉल आया, न कोई फ़ोन था,
टूटा वो दिल , बिखर सा गया था
वो मासूम सा चेहरा फिर याद आया,
जिसे चाहते थे, वहीँ नाम आया
मिली न मुझको, वो दूर जा चुकी थी
ऐसी वो घटना, घटी जा चुकी थी......घटी जा चुकी थी.......!!!

                             
                                                                            द्वारा :- संदीप शरद
                                                                            सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
                                                                             बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर

चुपके चुपके हँसता हूँ, मैं चुपके हँसता हूँ........@@!!!




ये प्यार मोहब्बत क्या होता, अल्फाज जमाना क्या कहता,
अरमान को लेकर फिरते हैं , ये कफ़न जमाना क्या कहता - 2 !
कुछ प्यार को लेकर फिरते हैं, कुछ नाम को लेकर फिरते हैं,
इंसानों की इस दुनियां में, कुछ अरमान को लेकर फिरते हैं !
आज उसी अरमानो की मैं साँज यहाँ सुनाता हूँ,
कुछ नहीं बनता यहाँ , फिर भी अंजान  सा रिश्ता बनाता हूँ !

एक राज सुनाता हूँ, कुछ बात सुनाता हूँ,
वो बात पुरानी थी, आज कुछ नई सुनाता हूँ !
अनजान थी वो मुझसे, अनजान था मैं उससे,
देखा जब मैंने, मानो पारी हो वो जैसे !
परियों की सहजादी , धरती पर आई थी,
चन्द पल ठहरी , पर खुशियाँ वो लाई थी !
उन खुशिओं ने मुझको , एक राज बताया था,
देख ले तू ये सपना , एक अरमान जगाया था !
दिन में तो हम हसते थे और रात में तनहा होते थे,
अरमान भी मेरे ऐसे थे, जो चुपके - चुपके रोते थे !
उस परिओं की सहजादी ने, मुझको खूब हँसाया था,
तब तनहा जब मैं रहता था, तो हँसता फिर मैं रहता था !
ऐसे ही अरमानो को, जब याद मैं करता हूँ,
तब दिल की बात करें मेरे दोस्त, मैं चुपके - चुपके हँसता हूँ ......और चुपके - चुपके हँसता हूँ....!

                                                                             द्वारा :- संदीप शरद
                                                                            सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)

                                                                             बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर

Monday, 9 April 2012

मैं तो इन्सान था, न जाने कहाँ खो गया हूँ...!!!!!

मैं इन्सान हूँ, प्यार को खोजता हूँ,
न जाने मेरा प्यार कहाँ  खो गया हैं ?
यहीं दुःख हैं यहीं पहचान हैं मेरी,
मैं तो इन्सान था, न जाने कहाँ खो गया हूँ?
अच्छा था जब प्यार न था मेरे जीवन में
आज तो मेरा सारा जीवन गम से भर गया हैं,
साथ देने को कहा था, मेरे जीवन के हर मोड़ तक
न जाने वो साथ कहाँ छूट गया हैं .......
उमर न थी मेरे प्यार करने की, पर वो ताउम्र हो गया हूँ
चला तो था दो कदम मैं भी, आज बेकदम हो गया हूँ,
कसमें खाई थी साथ जीने और मरने की
न जाने वो कहा खो गया हैं.....?
रास्ता था सीधा, और मैं भी चल पड़ा था
न जाने ये मोड़ कहा से आ गया हैं....?
साथ छुटा हमारा इस कदर , जैसे हम नदी के  दो किनारे बन गए हैं,
फिर भी हमने किनारों को मिलाना चाहा, लेकिन हम फिर किनारे हो गए हैं ....
हम तो इन्सान थे बस आज गम के हो गए हैं.
यहीं दुःख हैं यहीं पहचान हैं मेरी,
मगर उस परछाई मे , मैं भी बहकर खो गया हूँ....
ये नाम न  था किसी और का, ये "शरद" हैं जो कहीं खो गया हैं ...................................!!!!!

                                                                                  द्वारा :- संदीप शरद
                                                                                  सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
                                                                             बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर

Tuesday, 3 April 2012

फर्क बस इतना हैं..........कि तू हैं वहां और मैं हूँ यहाँ.......!!!!!!!.....


मेरे गम को, मेरी बेवसी को, न कोई समझा यहाँ
बस आग बुझाने को चले आते हैं यहाँ,
पैदा किया मुझको भी, उसको भी एक माँ ने यहाँ
फर्क बस इतना हैं, मैं हूँ यहाँ और वो हैं वहां,
किसी का शौक नहीं बनता, किसीका बिस्तर बनना
वो तो गरीबी हैं, जो इन्सान को बिस्तर तक ले आती हैं यहाँ,
ये तो बिस्तर पर, हमबिस्तर बन जाते हैं यहाँ
मगर इन्हें बनाने वाले, अक्सर गुमनाम हो जाते हैं यहाँ,
कभी सोचा नहीं, कि इन्हें बनाया किसने
बनाने वाले, तो अक्सर एक राज बन जाते हैं यहाँ,
राज भी ऐसे होते हैं, जो गुमनाम होते हैं यहाँ
बेक़सूर ही, कसूरवार बन जाते हैं यहाँ,
लोग सोचते हैं, देखते हैं, बदनाम नजरो से यहाँ
पर वो जानते नहीं, कि इनकी जिंदगी भी कितनी गुमनाम हैं यहाँ,
हर रोज आते हैं, लोग अपनी प्यास बुझाने को यहाँ
पर वो शायद जानते नहीं, वो भी किस माँ कि बेटी हैं यहाँ,
फर्क बस इतना हैं..........कि तू हैं वहां और मैं हूँ यहाँ.......!!!!!!!.....:(

                                                                                  द्वारा :- संदीप शरद
                                                                                  सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
                                                                             बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर

एक प्यार चाहिए.......!!!!!


दरमियाँ हैं जिन्दगीं अल्फाज कह गए
एक राज हैं यहीं, आफताब कह गए,
किसने कहा की प्यार हैं, दूरियां यहाँ
ये प्यार - व्यार क्या हैं?, इन्सान कह गए,
जब प्यार हो गया यहाँ , तो एक नाम चाहिए
दो दिलों के बीच का एक राज चाहिए,
जब राज न मिला तो एक अल्फाज चाहिए
अल्फाज के दिलों का एक साज चाहिए,
जब साज मिल गए, तब दरमियाँ यहाँ
दरमियाँ हैं जिंदगी अल्फाज कह गए,...

अनजान लोग मिलते हैं, अन्जान सी जगह
उस अन्जान से मिलने के लिए, एक इन्सान चाहिए,
इन्सान भी वो कैसा, इन्सान चाहिए
इंसान बनने के लिए, एक प्यार चाहिए,
इस प्यार को पाने के  लिए एक राज चाहिए,
एक राज हैं यहाँ, अफताब कह गए,
दरमियाँ हैं जिंदगी अल्फाज कह गए.....

बेताब लोग हैं यहाँ , बेताब जिंदगी
बेताब हैं इन्सां यहाँ, बेताब हैं ख़ुशी,
बेताब ख़ुशी के लिए एक इन्सान चाहिए,
इंसान बनाने के लिए एक प्यार चाहिए.....एक प्यार चाहिए......!!!

                                                                                  द्वारा :- संदीप शरद
                                                                                  सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
                                                                             बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर

Monday, 26 March 2012

.....@@....अहसास....@@...!!



एक दिल की कहानी को सुनाने मैं आया हूँ,
हर ख्वाब की कश्ती को किनारे मैं लाया हूँ,
आंधी भी बहुत तेज हैं, बारिश भी बहुत हैं,
ये मोहब्बत जो किया हमने, सुनामी की तरह हैं,
एक बार जो आती हैं, कुछ बचता भी नहीं हैं,
जो बच गया यारों, वो मुकद्दर का धनी हैं,
मजनू भी यहाँ था, लैला भी यहाँ थी,
जब प्यार हुआ इनमें, तो सुनामी ये  बनी थी,
लोगो ने उसे प्यार का एक नाम दिया था,
जब टूट गए दोनों, वो सुनामी का कहर था,..........!!

आज सुनाता हूँ तुम्हें एक नई कहानी,
वर्षों सी नहीं हैं, पर कुछ हैं ये पुरानी,
ये कहानी भी उनकी हैं, जिनके शब्द हैं मिलते,
ये कैसी जवानी, मगर हैं एक तरफा कहानी-.....हैं एक तरफा कहानी...
जब दरमियाँ ये जिंदगी, कहने ये लगी थी,
तब प्यार की ये घटना ऐसे ही घटी थी,
न बात किया हमने, न आवाज दिया था,
उस चहरे पर अलग सा एक अहसास बना था,
मैं जनता नहीं था, कैसा ये प्यार था??,
लेकिन मुझे पता, वो एक तरफा प्यार था,
नादान था यूँ मैं भी, अनजान भी मैं था,
वो तो किसी और की बन कर ही रह गई,
मुझको पता न था, सच कहता जवाना,
फिर भी मैं प्यार के फ़साने मैं बह गया,
मैं सोचता रहा, वह अहसास लाएगी,
एहसास के फसाने में, मैं जलाता चला गया,
गुजर गया समय वो शाम आ गई,
वो दिन था उजाले की फिर रात आ गईं.......!!!
                                                                                    द्वारा :- संदीप शरद
                                                                                  सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
                                                                             बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर




Saturday, 24 March 2012

@@....अल्फ़ाज.....@@.....!!!!




हम अल्फाज़ खोजते हैं अल्फाज नहीं मिलते,
अरमान मेरे दिल के हर बार नहीं मिलते!
हसते तो हम भी ऐसे, खुशियाँ हो मानों जैसे,
जब टूटते हैं दिल से तो राज नहीं मिलते!!
अरमान खोजते  हैं , आराम खोजते  हैं ,
इस दर्द भरी दुनियां में एक राज खोजते  हैं !
उस राज के लिए हर बार सोचते  हैं ,
कोई मरता हैं दिल से ऐसे कोई प्यार खोजते  हैं,
कोई खुशनसीब होता, कोई बदनसीब होता,
जो करता प्यार दिल से, वो जीत सोचते  हैं,
हारा वही यहाँ पर,जो अपना ही सोचते  हैं,
सोचा हैं दिल से ऐसे, वो राज हैं यहीं पर ,
वो अपनों के लिए ही , एक राज खोजते  हैं,
हम अल्फाज खोजते हैं,अल्फाज नहीं मिलते,
अरमान मेरे दिल के हर बार नहीं  मिलते ..........

 वो गम भी देखता हूँ, वो राज सोचता हूँ,
गरीब की कहानी इन्सां को सोचता हूँ,
महंगा हुआ यहाँ पर, एक राज बन गया हैं,
गरीब था वो इन्सां ,एक लाश बन गया हैं
सोचा था हमने ऐसे, आएगा कोई जैसे,
महंगा हुआ जवाना, खायेगा फिर वो कैसे,
गरीब था जो इन्सां वो हर रात मर रहा हैं,
पसीने की कमाई, अमीर भर रहा हैं,
गुलाम था जो भारत , आज याद आया,
वो अंग्रेज भी थे अच्छे,.... जब भ्रटाचार आज आया,
हम कैद हो गए हैं, एक राज बन गए हैं,
शमसान में बैठे, एक लाश बन गए हैं,
उस लाश की कहानी , एक अल्फाज खोजते हैं,
अरमान मेरे दिल के, हर बार खोजते हैं.....
ऐसी थी ये कहानी जो हम दिन और रात खोजते हैं
अल्फ़ाज खोजते हैं और अल्फ़ाज खोजते हैं ......!!!!

                                                                                               द्वारा :- संदीप शरद
                                                                                              सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
                                                                                             बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर





Monday, 13 February 2012

न वो जानता था, न वो जानती थी....(Valentine Special)



न वो जानता था, न वो जानती थी,
किस्सा पुराना न पहचानती थी,
मिलते थे राहों में अनजान बनकर,
न वो जानती थी न हम जानते थे,
खतों का लिखना, वो बाते फिर करना,
वो रातों को फिर सपनो में मिलना,
ऐसी हकीकत न हम जानते थे न वो जानती थी,
मोहब्बत का फ़साना शुरु होगा ऐसा,
मानो की बारिश का मौषम हो जैसा,
बारिश में भीगा करते थे ऐसे,न वो जानती थी न हम जानते थे,
करीब वो आना, लबों का मिलाना,
ऐसे रिश्ते को न भूल पाना...न वो जानती थी न हम जानते थे...
न सोचा था हमने , कि  ऐशा भी होगा,
लबों को मिलना , फिर लबों से दूर जाना,
यादों का मिलना, फिर भूल जाना,
ऐसे ही रिश्ते को क्या खूब निभाना,
न वो जानती थी न हम जानते थे,
सोचा था हमने कि पूछेंगे उनसें ,
रिश्ता क्यों तोड़ा, तुमने फिर हमसे,
पर ये वो जानती थी ....और सिर्फ वो जानती थी.....!!!!!!!

                                                                                               द्वारा:- संदीप शरद
                                                                        सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
                                                                                          अच्.बी.टी.आई , कानपूर

भारत के गरीब की आत्म कथा...!!


कलम उठाया, बात उठाई, लिख डाला नए जज्बात यहाँ!
प्यार को समझा, नफ़रत समझी, न समझा इंसान यहाँ!!
रात को तन्हा, दिन में तन्हा, लिख डाला जज्बात यहाँ!
दुनियां की ताकत को समझा, अपने को कमजोर यहाँ!!
दुनियां देखा, रब को देखा, न आया कुछ फर्क यहाँ!
नेता देखा, अभिनेता देखा, देखा तो भ्रस्टाचार यहाँ!!
भारत रोया , जनता रोई, नाम यहाँ सामान हैं,
ये गरीब को कुचला करते हैं, ये भारत का अपमान हैं!,
इतिहाश के पन्ने को पलटा, तब आया एक ख्वाब यहाँ,
भारत अपना था, अब मानो गुमनाम यहाँ,
हर लम्हा सोचा करते थे, जीना कितना आसान यहाँ,
जब जीने की राह में पहुचे, तब आया कुछ याद यहाँ,
याद वो लम्हा करते थे, और चुपके - चुपके रोते थे,
दिन को तो हम हस्ते थे और रात को तन्हा होते थे,
ऐसे ही जज्बात को हमने , बना डाला हैं धार यहाँ,
अब भारत की रक्षा करने के खातिर, आज निकाली तलवार यहाँ......!!!

                                                                          द्वारा :- संदीप शरद,
                                             Seniour  : प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
                                                    बी.टेक.:- अच्.बी.टी.आई. कानपूर


Friday, 10 February 2012

एक प्यार की सच्ची कहानी .........!! (17/09/2007)



एक अंजान लडकी से किसी मोड़ पर मुलाक़ात हो गई,
देखते ही देखते वो मेरे साथ हो गई,
जिंदगी की आस मैं बैठा हुआ था मैं,
और उसकी याद में , कुछ लिख रहा था मैं,
शायद खुशनसीब था , और चल पढ़ा था यूँ,
दर्शन माँ के कर चुका था यूँ ,
मुझको न पता क्या हो रहा हैं ये, बस जिंदगी की आस मैं जी रहा था मैं,
जब माँ के दर्शन हुए तो खुशनसीब था, जिंदगी का साथ शायद अब मुझको नसीब था,
चल पड़ी वो मेरे साथ ऐसे मानकर , मान लो उसे जैसे माँ का आशीर्वाद जानकर!
पहुचे था कटरा, और यादों का झुण्ड था,  
बस इन्ही यादों में उसीका नूर था!
जिंदगी फिर चल पड़ी , जैसे की कोई मिल गया,
उसकी याद में मेरा दिल फिर खिल गया,
मासूम सा चेहरा , मुझको तो याद हैं,
मेरा वो साथ, क्या उसको याद हैं?,
जम्मू से यादें लिए ,मैं  फिर चल पड़ा,ऐसा ही प्यार शायद मुझको नसीब था,
.....ये मेरे जज्बात थे जो मैंने  पिरो दिए,
और उसके जज्बात मुझको न मालूम था,
की उसके दिल में क्या मेरा ही प्यार था?;
चल पड़ा फिर घर की ओर मै.........
यादों को अपने सीने दफ़न करता चला गया,
क्योकि प्यार और मोहब्बत देख चुका था मैं,
और जिंदगी से आगे निकल चुका था मैं,
प्यार पर मुझको अब बिल्कुल न यकीन था..,
था तो भरोसा , वो दोस्ती प्यार का,
ऐसी मिली वो दोस्ती, जैसे वरसों का प्यार था,
बदली ये दोस्ती , जैसे मोहब्बत के रंग में,
और हार गई आज, इस प्यार के जुंग में!,
ऐसा ही प्यार शायद मुझको नसीब था,
पर मुझको न मालूम , क्या ये प्यार उसको कबूल था,
बस ऐसी ही कहानी को मैंने संजों दिया,
प्यार और मोहब्बत के शब्दों को आज दिल से पिरो दिया................!!


                                                                                                                               द्वारा:- संदीप शरद 
                                                  सेनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल) 
                                                  बी.टेक. :- अच्. बी. टी. आई. कानपूर 


Thursday, 9 February 2012

मेरी हर ख़ुशी हर कहानी................!!




This is dedicated to my source of inspiration who gifted the first line to begin with.


मेरी धडकनों  की  रवानी  है  तुमसे ,मेरी  हर  ख़ुशी  हर  कहानी  है  तुमसे,
शुरु होती थी कहानी जब हँसता था मैं,बंद आखो से उसको प्यार करता था मैं,
सोचा कह दूंगा अपने हर दिल की बात उससे...
पर ये न जाना था , वो प्यार न करती थी मुझसे,
चंद लम्हे साथ बिताये थे हमने, लगता की वरसों का साथ हो जैसे ,
मिलने की बाते किया करते थे तुमसे,पर न मिल पाते थे वरसों तक तुमसे,
इसी दूरी को एक अहसास समझ बैठे हम, और शायद उनसे प्यार कर बैठे हम,
पर ये राज अधूरा ही रहता, क्योकि प्यार भी एक तरफ़ा ही रहता,
सोचा पूछूँगा एक बार मैं उनसे, क्या प्यार किया तुमने भी हमसे?
जब पूछा हमने इस राज को , वो दूर हमसे हो गई उसी रात को!
वो रिश्ता भी टूटा, साथ भी छूटा, बस रह गए अल्फाज को,
वो मेरा प्यार भी झूठा , गम भी झूठा , बस रह गए अरमान को,
उस अरमान को मैं एक लाश बना बैठा,
क्यों की गलती उसकी न थी ,गलत मैं समझ बैठा,
दोस्ती के रिश्ते को मैं प्यार बना बैठा,
 ऐसी ही कहानी हमने लिखी हैं तुमसे, क्योंकी मेरी हर ख़ुशी हर कहानी हैं तुमसे!!

                                                                                                            


                                                                                                                द्वारा :- संदीप शरद 
                                                                                                        सेनिओर प्लानिंग इंजिनियर 
                                                                                                         अच्. बी. टी. आई. कानपूर 
   















Sunday, 5 February 2012

एक कहानी वरसों पुरानी..





एक साज लिख रहां हूँ, कई बार लिख रहा हूँ,
मैं दूसरों का गम, हर बार लिख रहा हूँ ,
कोई प्यार में हैं डूबा, कोई याद मे हैं डूबा ,
उस डूबते की कश्ती हर बार लिख रहा हूँ!
वो कश्ती भी हैं पुरानी , वो राज था पुराना,
वो प्यार का फ़साना वो दिल का हैं तराना,
दुनियाँ को देखती हैं , नजरे थी पुरानी ,
वो प्यार की जवानी , दौलत की हैं कहानी,
कोई भूखा मर रहा हैं, कोई प्यासा ही मर रहा हैं,
गरीब था वो इंसां, इंसां की हैं कहानी,
ऐसी हैं वो जवनी,  ऐसी हैं वो जवानी..... !!
मैं साज लिख रहा हूँ, अरमान लिख रहा हूँ,
गरीब था वो इंसा, गरीब की कहानी ,
मैं प्यार लिख रहा हूँ, जज्बात की कहानी,
दुनियाँ से दूर आकर मैं ख्वाब लिख गया हूँ,
वो प्यार का खजाना, मैं साज लिख गया हूँ,
ठोकर लगी तो मैं, गिर गया जमीं पर,
उस जमीं के खातिर एक राज लिख गया हूँ,
वतन की थी मिटटी, खोमश बन गई हैं,
लोगो ने मारा उसको, एक लाश बन गई हैं!!
कैसे कहूं मैं यारों, एक फ़रियाद लिख रहां हूँ,
आज अकेला बैठा, एक राज लिख रहा हूँ,
वर्षों पुराना एक ख्वाब लिख रहां हूँ,
भारत का हूँ एक इंसा , जो याद लिख रहा हूँ,
फ़रियाद लिख रहा हूँ, एक साज लिख रहा हूँ,
मुझको नहीं पता, मैं क्यों ये लिख रहां हूँ,
एक प्यार का फ़साना हर बार लिख रहा हूँ,
मैं सोचता हूँ हर दम, ख़तम करूं कहाँ पर,
ख़तम  नहीं होती ये प्यार की कहानी,
वो कश्ती थी पुरानी, वो कश्ती थी पुरानी,
एक राज लिख रहा हूँ वर्षों की थी पुरानी वर्सो की थी पुरानी!


                                                                                    द्वारा ..संदीप शरद
                                                                             सीनिईर प्लानिंग इंजिनियर
                                                                     बी. टेक -   अच्. बी .टी .आई. कानपूर



Wednesday, 25 January 2012

प्यार का अमन ...

तेरा हर नाज उठाना चाहता हूँ, तुझे पलकों में बैठाना चाहता हूँ,
तेरे प्यार में अपनी पूरी दुनियां मिटाना चाहता हूँ,
वादा किया था साथ जीने और मरने का, उसी के हर जज्बात को बताना चाहता हूँ,
तेरा हर नाज उठाना चाहता हूँ................
जब दोस्ती की थी जवानी दहलीज में आकर , अब प्यार का इजहार करना चाहता हूँ,
प्यार और मोहब्बत की बुनियाद रख दी हमने , अब प्यार और इश्क की फ़रियाद चाहता हूँ,
अमन चाहता हूँ, प्यारा सा कफ़न चाहता हूँ..उसी के हर जज्बात को बताना चाहता हूँ,
जिंदगी के हर गम को सीने से लगाना चाहता हूँ, मैं सिर्फ तुझे चाहता हूँ तेरा प्यार चाहता हूँ,
प्यार के हर जज्बात को अपने कालमो से पेरोना चाहता हूँ , मैं इस दुनिया से अनजान लोगो को पहचानना चाहता हूँ,..
प्यारा सा अमन चाहता हूँ, और तेरा प्यार चाहता हूँ....बस तेरा प्यार चाहता हूँ...!!!
                                                                                                       द्वारा ..संदीप शरद
                                                                                              सीनिईर प्लानिंग इंजिनियर
                                                                                बी. टेक -   अच्. बी .टी .आई. कानपूर

Tuesday, 24 January 2012

...........अकेला......!!!

इस कदर चला जा रहा हूँ , अकेला ही चला जा रहा हूँ,
करवटें बदलती यें जिंदगी , जिन्दगीं से इम्तिहान लिए चला जा रहा हूँ ...बस चला जा रहा हूँ..,
अकेला था तब भी , अकेला हूँ अब भी,
इसी सिलसिले को आगे बढाएं चला जा रहा हूँ,
पढाई वो करना , वो कॉलेज मे आना , इंजिनियर सा हमको वो इंसा हैं बनना,
इंसा को प्यार था किसीसे फिर करना,वो प्यार था मोहब्बत मैं बदलना ,
इसी किस्से को आगे था चलना, चलकर इसे था यूँ शादी में बदलना ,
न सोचा था ऐसी ये घटना घटेगी, वो लड़की मेरे साथ आगे ना चलेगी,
जैसे दुनियां थी ठहरी और कदम रुक पड़े थे
जिसको जाना ना हमने और माना ना हमने , ऐसे ही हाथ हमको मिले थे!!
सहारा मिला और फिर मैं चल पड़ा था, कदम द- कदम मौत का कारवां था..
जिसे छोड़कर मैं आया यहाँ  पर , जिंदगी को जीना था  सीखा वहां  पर ,
ना होता हैं अपना इस जहाँ पर कोई , सीखा था हमने इसी दुनिया में आकर ,
मुझे था ना मालूम की कौन हैं हमसफ़र मे,
पीछे ना पलता , ना पथभ्रष्ट में हुआ था.
क्योंकी उस समय था अकेला और अकेला चला था,
कदम द- कदम मौत का कारवां था....!!!

.                                                                                             द्वारा ..संदीप शरद
                                                                                              सीनिईर प्लानिंग इंजिनियर
                                                                                बी. टेक -   अच्. बी .टी .आई. कानपूर

धुंआ .........!!!!


पल पल मैन भी जीता रहता, पल पल मैन भी मरता हूँ
पल पल तेरे याद में आकर मैं भी खोया रहता हूँ,
ऐसे ही जज्बात वो हमने लिख डाले हैं कालमो से
प्यार मोहब्बत क्या ये होता ना जाना हैं वरसों से,
ऐसे ही हज्बात को हमने दिल से युहीं उतारा हैं
प्यार तो हमको हुआ नहीं,  हाँ हर गम को धुँआ बनाया हैं !!
धुँआ बनाया हर गम को, और दिल की युहीं फ़रियाद लिखी,
ऐसी ही हमने याद लिखी और दिल की ऐसी साज लिखी,
हमने तो हर पैमाने को ओठो से युहीं लगाया हैं,
हमको क्या, हमने तो हर गम को धुँआ बनाया हैं !!

प्यार नहीं , यूँ इश्क नहीं ऐसे जज्बात हमने लिखे नहीं,
प्यार का मतलब क्या होता ऐसी फ़रियाद हमने लिखी नहीं,
जीना तो हमने हैं सीखा पर मरना  हमने सीखा नहीं,
दुनिया वाले ये क्या कहते, ऐसा हमने फिर किया नहीं,
लोगो ने हमसे प्यार किया और हमने प्यार किया नहीं,
समझा हमको धोखेबाज और धोखा हमने दिया नहीं,
ऐसे ही जज्बातों को हमने युहीं उतारा हैं,
हमको क्या हमने तो हर गम को धुँआ बनाया हैं!!

अब जब हमको प्यार हुआ तो प्यार भी हमने देखा नहीं,
जीवन का मतलब क्या होता ,जीवन तो हमने जीना सीखा नहीं,
प्यार हमारा ऐसा हो, ऐसा हमने यूँ सोचा नहीं,
मानो की कश्ती जाएँ बहारों मैं, और उसको पार फिर लगना नहीं,
ऐसा ही प्यार हमारा था , जिसने हमको धुत्कार दिया,
जिसके खातिर क्या करते , उसने तो जीवन त्याग दिया,
ऐसा ही प्यार हामारा था . जिसको हमने फिर याद किया,
याद किया , फ़रियाद किया, अपना जीवन बर्बाद किया,
ऐसे ही गम को मैं सारा जीवन साथ चलता हूँ ,
मुझको क्या मैं तो हर गम को धुँआ बनाता हूँ!!
.                                                                                             द्वारा ..संदीप शरद
                                                                                              सीनिईर प्लानिंग इंजिनियर
                                                                                बी. टेक -   अच्. बी .टी .आई. कानपूर

हमें लक्ष्य को पाना हैं , कुछ करके दिखाना हैं ...!!!!!

प्यार के वास्ते...

मेरे दिल की देखो पारी जा रही हैं ,
बहारो की मल्लिका चली जा रही हैं ,
सुबह शाम उसकी यू याद आ रही हैं,
याद आ रही हैं चली जा रही हैं,
मेरे दिल को यू छोरे जा रही हैं, परी जा रही हैं,,,,,,चली जा रहीं हैं ....
दिल की ये धरकने मुझे बता रहीं हैं,
पारी भी तो मुझको बहुत चाह रही हैं , मगर चली जा रहीं हैं ....
उसकी यादों के सहारे जियें जा रहा हूँ ,
चला जा रहा हूँ .. मैं भी चला जा रहा हूँ.......
राहों को मैं भी चुने जा रहा हूँ ...उसके पीछे मैं भी चला जा रहा हूँ...बस चला जा रहा हूँ......!!!
राहों पे काटें बिछे जा रहे हैं , चुभे जा रहे हैं ..और चुभे जा रहे हैं ...
लेकिन हम उन्ही पर चले जा रहे हैं ..चले जा रहे हैं...!!

वतन के वास्ते....!!!


....वतन के सिपाही यूं बढे जा रहे हैं,
देखो सहीद जा रहे हैं...चले जा रहे हैं...
सलामी उन्हें हम दिए जा रहे हैं, चले जा रहे हैं बढे जा रहे ,
कश्मीर को अपना लिए जा रहे हैं, बढे जा रहे हैं बस चले जा रहे हैं .....

बच्चो और नवजवानों के वास्ते....

...... ये बच्चे भी आगे चले जा रहे हैं,
कोई  आइ.ऐ .एस, कोई पी.सी.एस , कोई बिसनेस मैन बने जा रहे हैं,
और भारत की रक्षा किये जा रहे हैं हैं...,
चले जा रहे हैं बढे जा रहे हैं ...
ठोकर लगी तो न रुका हैं वहा पर ,
सपूत हैं वो भारत के बढे जा रहे हैं हैं ..चले जा रहे हैं ...
मिसाइल जो बनाया अब्दुल कलाम ने ,
मिसाइल मैन वो भी कहें जा रहे हैं ...बढे जा रहे हैं ..!!
कश्ती जो डूबी थी, कश्ती पुरानी..
हम लहरों से लढ़े जा रहे हैं ,.
किनारें लगें जा रहे हैं बढे जा रहे हैं ..
चले जा रहे हैं और चले जा रहे हैं..और चले जा रहे हैं .. ......................द्वारा ..संदीप शरद
                                                                                              सीनिईर प्लानिंग इंजिनियर
                                                                                बी. टेक -   अच्. बी .टी .आई. कानपूर