मैं भी बैठा रात को ऐसे गुमनामों की अंधियारी में,
सोचा करता दिन भर ऐसे, दुनियां की गलियालो में,
ये प्यार वफ़ा सब धोखा हैं, अंजानो की इस दुनियां में,
यहाँ न कोई अपना हैं, दुनियां के खेल तमाशे में,
जब साथ यहाँ पर देते हो, तब मतलब के बन जाते हो,
ऐ तुम कैसे इन्सां हों, जो ताश का खेल बनाते हो,
हस्ते हो तो हस्ते हो, रोते हो तो खूब रुलाते हो,
तुम तो ऐसे पत्थर हो, जो रेत में धूल बन जाते हो,
ये तो गुमनामों की अंधियारी में, ऐसा साज उतारा था
जो बनते थे हुनर में ऐसे, उनको नीचे उतारा था,
मत भूलो ऐ इंशा तू, समय बड़ा बलवान हैं,
आज तो तू बढ़ता जाता, कल यहीं तू गुमनाम हैं.......बस कल यहीं तू गुमनाम हैं ..!!!
द्वारा :- संदीप शरद
सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
बी . टेक . :- एच. बी. टी. आई. - कानपूर