Monday, 13 February 2012

न वो जानता था, न वो जानती थी....(Valentine Special)



न वो जानता था, न वो जानती थी,
किस्सा पुराना न पहचानती थी,
मिलते थे राहों में अनजान बनकर,
न वो जानती थी न हम जानते थे,
खतों का लिखना, वो बाते फिर करना,
वो रातों को फिर सपनो में मिलना,
ऐसी हकीकत न हम जानते थे न वो जानती थी,
मोहब्बत का फ़साना शुरु होगा ऐसा,
मानो की बारिश का मौषम हो जैसा,
बारिश में भीगा करते थे ऐसे,न वो जानती थी न हम जानते थे,
करीब वो आना, लबों का मिलाना,
ऐसे रिश्ते को न भूल पाना...न वो जानती थी न हम जानते थे...
न सोचा था हमने , कि  ऐशा भी होगा,
लबों को मिलना , फिर लबों से दूर जाना,
यादों का मिलना, फिर भूल जाना,
ऐसे ही रिश्ते को क्या खूब निभाना,
न वो जानती थी न हम जानते थे,
सोचा था हमने कि पूछेंगे उनसें ,
रिश्ता क्यों तोड़ा, तुमने फिर हमसे,
पर ये वो जानती थी ....और सिर्फ वो जानती थी.....!!!!!!!

                                                                                               द्वारा:- संदीप शरद
                                                                        सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
                                                                                          अच्.बी.टी.आई , कानपूर

भारत के गरीब की आत्म कथा...!!


कलम उठाया, बात उठाई, लिख डाला नए जज्बात यहाँ!
प्यार को समझा, नफ़रत समझी, न समझा इंसान यहाँ!!
रात को तन्हा, दिन में तन्हा, लिख डाला जज्बात यहाँ!
दुनियां की ताकत को समझा, अपने को कमजोर यहाँ!!
दुनियां देखा, रब को देखा, न आया कुछ फर्क यहाँ!
नेता देखा, अभिनेता देखा, देखा तो भ्रस्टाचार यहाँ!!
भारत रोया , जनता रोई, नाम यहाँ सामान हैं,
ये गरीब को कुचला करते हैं, ये भारत का अपमान हैं!,
इतिहाश के पन्ने को पलटा, तब आया एक ख्वाब यहाँ,
भारत अपना था, अब मानो गुमनाम यहाँ,
हर लम्हा सोचा करते थे, जीना कितना आसान यहाँ,
जब जीने की राह में पहुचे, तब आया कुछ याद यहाँ,
याद वो लम्हा करते थे, और चुपके - चुपके रोते थे,
दिन को तो हम हस्ते थे और रात को तन्हा होते थे,
ऐसे ही जज्बात को हमने , बना डाला हैं धार यहाँ,
अब भारत की रक्षा करने के खातिर, आज निकाली तलवार यहाँ......!!!

                                                                          द्वारा :- संदीप शरद,
                                             Seniour  : प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
                                                    बी.टेक.:- अच्.बी.टी.आई. कानपूर


Friday, 10 February 2012

एक प्यार की सच्ची कहानी .........!! (17/09/2007)



एक अंजान लडकी से किसी मोड़ पर मुलाक़ात हो गई,
देखते ही देखते वो मेरे साथ हो गई,
जिंदगी की आस मैं बैठा हुआ था मैं,
और उसकी याद में , कुछ लिख रहा था मैं,
शायद खुशनसीब था , और चल पढ़ा था यूँ,
दर्शन माँ के कर चुका था यूँ ,
मुझको न पता क्या हो रहा हैं ये, बस जिंदगी की आस मैं जी रहा था मैं,
जब माँ के दर्शन हुए तो खुशनसीब था, जिंदगी का साथ शायद अब मुझको नसीब था,
चल पड़ी वो मेरे साथ ऐसे मानकर , मान लो उसे जैसे माँ का आशीर्वाद जानकर!
पहुचे था कटरा, और यादों का झुण्ड था,  
बस इन्ही यादों में उसीका नूर था!
जिंदगी फिर चल पड़ी , जैसे की कोई मिल गया,
उसकी याद में मेरा दिल फिर खिल गया,
मासूम सा चेहरा , मुझको तो याद हैं,
मेरा वो साथ, क्या उसको याद हैं?,
जम्मू से यादें लिए ,मैं  फिर चल पड़ा,ऐसा ही प्यार शायद मुझको नसीब था,
.....ये मेरे जज्बात थे जो मैंने  पिरो दिए,
और उसके जज्बात मुझको न मालूम था,
की उसके दिल में क्या मेरा ही प्यार था?;
चल पड़ा फिर घर की ओर मै.........
यादों को अपने सीने दफ़न करता चला गया,
क्योकि प्यार और मोहब्बत देख चुका था मैं,
और जिंदगी से आगे निकल चुका था मैं,
प्यार पर मुझको अब बिल्कुल न यकीन था..,
था तो भरोसा , वो दोस्ती प्यार का,
ऐसी मिली वो दोस्ती, जैसे वरसों का प्यार था,
बदली ये दोस्ती , जैसे मोहब्बत के रंग में,
और हार गई आज, इस प्यार के जुंग में!,
ऐसा ही प्यार शायद मुझको नसीब था,
पर मुझको न मालूम , क्या ये प्यार उसको कबूल था,
बस ऐसी ही कहानी को मैंने संजों दिया,
प्यार और मोहब्बत के शब्दों को आज दिल से पिरो दिया................!!


                                                                                                                               द्वारा:- संदीप शरद 
                                                  सेनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल) 
                                                  बी.टेक. :- अच्. बी. टी. आई. कानपूर 


Thursday, 9 February 2012

मेरी हर ख़ुशी हर कहानी................!!




This is dedicated to my source of inspiration who gifted the first line to begin with.


मेरी धडकनों  की  रवानी  है  तुमसे ,मेरी  हर  ख़ुशी  हर  कहानी  है  तुमसे,
शुरु होती थी कहानी जब हँसता था मैं,बंद आखो से उसको प्यार करता था मैं,
सोचा कह दूंगा अपने हर दिल की बात उससे...
पर ये न जाना था , वो प्यार न करती थी मुझसे,
चंद लम्हे साथ बिताये थे हमने, लगता की वरसों का साथ हो जैसे ,
मिलने की बाते किया करते थे तुमसे,पर न मिल पाते थे वरसों तक तुमसे,
इसी दूरी को एक अहसास समझ बैठे हम, और शायद उनसे प्यार कर बैठे हम,
पर ये राज अधूरा ही रहता, क्योकि प्यार भी एक तरफ़ा ही रहता,
सोचा पूछूँगा एक बार मैं उनसे, क्या प्यार किया तुमने भी हमसे?
जब पूछा हमने इस राज को , वो दूर हमसे हो गई उसी रात को!
वो रिश्ता भी टूटा, साथ भी छूटा, बस रह गए अल्फाज को,
वो मेरा प्यार भी झूठा , गम भी झूठा , बस रह गए अरमान को,
उस अरमान को मैं एक लाश बना बैठा,
क्यों की गलती उसकी न थी ,गलत मैं समझ बैठा,
दोस्ती के रिश्ते को मैं प्यार बना बैठा,
 ऐसी ही कहानी हमने लिखी हैं तुमसे, क्योंकी मेरी हर ख़ुशी हर कहानी हैं तुमसे!!

                                                                                                            


                                                                                                                द्वारा :- संदीप शरद 
                                                                                                        सेनिओर प्लानिंग इंजिनियर 
                                                                                                         अच्. बी. टी. आई. कानपूर 
   















Sunday, 5 February 2012

एक कहानी वरसों पुरानी..





एक साज लिख रहां हूँ, कई बार लिख रहा हूँ,
मैं दूसरों का गम, हर बार लिख रहा हूँ ,
कोई प्यार में हैं डूबा, कोई याद मे हैं डूबा ,
उस डूबते की कश्ती हर बार लिख रहा हूँ!
वो कश्ती भी हैं पुरानी , वो राज था पुराना,
वो प्यार का फ़साना वो दिल का हैं तराना,
दुनियाँ को देखती हैं , नजरे थी पुरानी ,
वो प्यार की जवानी , दौलत की हैं कहानी,
कोई भूखा मर रहा हैं, कोई प्यासा ही मर रहा हैं,
गरीब था वो इंसां, इंसां की हैं कहानी,
ऐसी हैं वो जवनी,  ऐसी हैं वो जवानी..... !!
मैं साज लिख रहा हूँ, अरमान लिख रहा हूँ,
गरीब था वो इंसा, गरीब की कहानी ,
मैं प्यार लिख रहा हूँ, जज्बात की कहानी,
दुनियाँ से दूर आकर मैं ख्वाब लिख गया हूँ,
वो प्यार का खजाना, मैं साज लिख गया हूँ,
ठोकर लगी तो मैं, गिर गया जमीं पर,
उस जमीं के खातिर एक राज लिख गया हूँ,
वतन की थी मिटटी, खोमश बन गई हैं,
लोगो ने मारा उसको, एक लाश बन गई हैं!!
कैसे कहूं मैं यारों, एक फ़रियाद लिख रहां हूँ,
आज अकेला बैठा, एक राज लिख रहा हूँ,
वर्षों पुराना एक ख्वाब लिख रहां हूँ,
भारत का हूँ एक इंसा , जो याद लिख रहा हूँ,
फ़रियाद लिख रहा हूँ, एक साज लिख रहा हूँ,
मुझको नहीं पता, मैं क्यों ये लिख रहां हूँ,
एक प्यार का फ़साना हर बार लिख रहा हूँ,
मैं सोचता हूँ हर दम, ख़तम करूं कहाँ पर,
ख़तम  नहीं होती ये प्यार की कहानी,
वो कश्ती थी पुरानी, वो कश्ती थी पुरानी,
एक राज लिख रहा हूँ वर्षों की थी पुरानी वर्सो की थी पुरानी!


                                                                                    द्वारा ..संदीप शरद
                                                                             सीनिईर प्लानिंग इंजिनियर
                                                                     बी. टेक -   अच्. बी .टी .आई. कानपूर