Wednesday, 25 January 2012

प्यार का अमन ...

तेरा हर नाज उठाना चाहता हूँ, तुझे पलकों में बैठाना चाहता हूँ,
तेरे प्यार में अपनी पूरी दुनियां मिटाना चाहता हूँ,
वादा किया था साथ जीने और मरने का, उसी के हर जज्बात को बताना चाहता हूँ,
तेरा हर नाज उठाना चाहता हूँ................
जब दोस्ती की थी जवानी दहलीज में आकर , अब प्यार का इजहार करना चाहता हूँ,
प्यार और मोहब्बत की बुनियाद रख दी हमने , अब प्यार और इश्क की फ़रियाद चाहता हूँ,
अमन चाहता हूँ, प्यारा सा कफ़न चाहता हूँ..उसी के हर जज्बात को बताना चाहता हूँ,
जिंदगी के हर गम को सीने से लगाना चाहता हूँ, मैं सिर्फ तुझे चाहता हूँ तेरा प्यार चाहता हूँ,
प्यार के हर जज्बात को अपने कालमो से पेरोना चाहता हूँ , मैं इस दुनिया से अनजान लोगो को पहचानना चाहता हूँ,..
प्यारा सा अमन चाहता हूँ, और तेरा प्यार चाहता हूँ....बस तेरा प्यार चाहता हूँ...!!!
                                                                                                       द्वारा ..संदीप शरद
                                                                                              सीनिईर प्लानिंग इंजिनियर
                                                                                बी. टेक -   अच्. बी .टी .आई. कानपूर

Tuesday, 24 January 2012

...........अकेला......!!!

इस कदर चला जा रहा हूँ , अकेला ही चला जा रहा हूँ,
करवटें बदलती यें जिंदगी , जिन्दगीं से इम्तिहान लिए चला जा रहा हूँ ...बस चला जा रहा हूँ..,
अकेला था तब भी , अकेला हूँ अब भी,
इसी सिलसिले को आगे बढाएं चला जा रहा हूँ,
पढाई वो करना , वो कॉलेज मे आना , इंजिनियर सा हमको वो इंसा हैं बनना,
इंसा को प्यार था किसीसे फिर करना,वो प्यार था मोहब्बत मैं बदलना ,
इसी किस्से को आगे था चलना, चलकर इसे था यूँ शादी में बदलना ,
न सोचा था ऐसी ये घटना घटेगी, वो लड़की मेरे साथ आगे ना चलेगी,
जैसे दुनियां थी ठहरी और कदम रुक पड़े थे
जिसको जाना ना हमने और माना ना हमने , ऐसे ही हाथ हमको मिले थे!!
सहारा मिला और फिर मैं चल पड़ा था, कदम द- कदम मौत का कारवां था..
जिसे छोड़कर मैं आया यहाँ  पर , जिंदगी को जीना था  सीखा वहां  पर ,
ना होता हैं अपना इस जहाँ पर कोई , सीखा था हमने इसी दुनिया में आकर ,
मुझे था ना मालूम की कौन हैं हमसफ़र मे,
पीछे ना पलता , ना पथभ्रष्ट में हुआ था.
क्योंकी उस समय था अकेला और अकेला चला था,
कदम द- कदम मौत का कारवां था....!!!

.                                                                                             द्वारा ..संदीप शरद
                                                                                              सीनिईर प्लानिंग इंजिनियर
                                                                                बी. टेक -   अच्. बी .टी .आई. कानपूर

धुंआ .........!!!!


पल पल मैन भी जीता रहता, पल पल मैन भी मरता हूँ
पल पल तेरे याद में आकर मैं भी खोया रहता हूँ,
ऐसे ही जज्बात वो हमने लिख डाले हैं कालमो से
प्यार मोहब्बत क्या ये होता ना जाना हैं वरसों से,
ऐसे ही हज्बात को हमने दिल से युहीं उतारा हैं
प्यार तो हमको हुआ नहीं,  हाँ हर गम को धुँआ बनाया हैं !!
धुँआ बनाया हर गम को, और दिल की युहीं फ़रियाद लिखी,
ऐसी ही हमने याद लिखी और दिल की ऐसी साज लिखी,
हमने तो हर पैमाने को ओठो से युहीं लगाया हैं,
हमको क्या, हमने तो हर गम को धुँआ बनाया हैं !!

प्यार नहीं , यूँ इश्क नहीं ऐसे जज्बात हमने लिखे नहीं,
प्यार का मतलब क्या होता ऐसी फ़रियाद हमने लिखी नहीं,
जीना तो हमने हैं सीखा पर मरना  हमने सीखा नहीं,
दुनिया वाले ये क्या कहते, ऐसा हमने फिर किया नहीं,
लोगो ने हमसे प्यार किया और हमने प्यार किया नहीं,
समझा हमको धोखेबाज और धोखा हमने दिया नहीं,
ऐसे ही जज्बातों को हमने युहीं उतारा हैं,
हमको क्या हमने तो हर गम को धुँआ बनाया हैं!!

अब जब हमको प्यार हुआ तो प्यार भी हमने देखा नहीं,
जीवन का मतलब क्या होता ,जीवन तो हमने जीना सीखा नहीं,
प्यार हमारा ऐसा हो, ऐसा हमने यूँ सोचा नहीं,
मानो की कश्ती जाएँ बहारों मैं, और उसको पार फिर लगना नहीं,
ऐसा ही प्यार हमारा था , जिसने हमको धुत्कार दिया,
जिसके खातिर क्या करते , उसने तो जीवन त्याग दिया,
ऐसा ही प्यार हामारा था . जिसको हमने फिर याद किया,
याद किया , फ़रियाद किया, अपना जीवन बर्बाद किया,
ऐसे ही गम को मैं सारा जीवन साथ चलता हूँ ,
मुझको क्या मैं तो हर गम को धुँआ बनाता हूँ!!
.                                                                                             द्वारा ..संदीप शरद
                                                                                              सीनिईर प्लानिंग इंजिनियर
                                                                                बी. टेक -   अच्. बी .टी .आई. कानपूर

हमें लक्ष्य को पाना हैं , कुछ करके दिखाना हैं ...!!!!!

प्यार के वास्ते...

मेरे दिल की देखो पारी जा रही हैं ,
बहारो की मल्लिका चली जा रही हैं ,
सुबह शाम उसकी यू याद आ रही हैं,
याद आ रही हैं चली जा रही हैं,
मेरे दिल को यू छोरे जा रही हैं, परी जा रही हैं,,,,,,चली जा रहीं हैं ....
दिल की ये धरकने मुझे बता रहीं हैं,
पारी भी तो मुझको बहुत चाह रही हैं , मगर चली जा रहीं हैं ....
उसकी यादों के सहारे जियें जा रहा हूँ ,
चला जा रहा हूँ .. मैं भी चला जा रहा हूँ.......
राहों को मैं भी चुने जा रहा हूँ ...उसके पीछे मैं भी चला जा रहा हूँ...बस चला जा रहा हूँ......!!!
राहों पे काटें बिछे जा रहे हैं , चुभे जा रहे हैं ..और चुभे जा रहे हैं ...
लेकिन हम उन्ही पर चले जा रहे हैं ..चले जा रहे हैं...!!

वतन के वास्ते....!!!


....वतन के सिपाही यूं बढे जा रहे हैं,
देखो सहीद जा रहे हैं...चले जा रहे हैं...
सलामी उन्हें हम दिए जा रहे हैं, चले जा रहे हैं बढे जा रहे ,
कश्मीर को अपना लिए जा रहे हैं, बढे जा रहे हैं बस चले जा रहे हैं .....

बच्चो और नवजवानों के वास्ते....

...... ये बच्चे भी आगे चले जा रहे हैं,
कोई  आइ.ऐ .एस, कोई पी.सी.एस , कोई बिसनेस मैन बने जा रहे हैं,
और भारत की रक्षा किये जा रहे हैं हैं...,
चले जा रहे हैं बढे जा रहे हैं ...
ठोकर लगी तो न रुका हैं वहा पर ,
सपूत हैं वो भारत के बढे जा रहे हैं हैं ..चले जा रहे हैं ...
मिसाइल जो बनाया अब्दुल कलाम ने ,
मिसाइल मैन वो भी कहें जा रहे हैं ...बढे जा रहे हैं ..!!
कश्ती जो डूबी थी, कश्ती पुरानी..
हम लहरों से लढ़े जा रहे हैं ,.
किनारें लगें जा रहे हैं बढे जा रहे हैं ..
चले जा रहे हैं और चले जा रहे हैं..और चले जा रहे हैं .. ......................द्वारा ..संदीप शरद
                                                                                              सीनिईर प्लानिंग इंजिनियर
                                                                                बी. टेक -   अच्. बी .टी .आई. कानपूर