शिला मिलना चाहिए, माहौल बदलना चाहिए,
शामिल हर एक पापी को, फ़ाशी पर लटकाना चाहिए ....!!
खुशियाँ भी अनजान थी, वो रात सूनसान थी,
दोस्त था, अरमान था, पर न जाना की वो कुछ पल का महमान था...
साथ भी टूटा , समय का वो पल भी टूटा ..
रात बीती तो अरमान भी टूटा.....
सपने भी टूटे,जज्बात भी टूटे...
टूटे हर वो रिश्ते ....और मेरे अल्फाज भी टूटे..
भारत रोया , जनता रोई..रोया हर अरमान यहाँ...
माँ का वो रिश्ता भी रोया... जिसने पाला २३ साल जहाँ...
सोचा न था , जाना न था, की सपने टूटे आज यहाँ
माँ मुझको तू वादा कर, न बक्शेगी पापी को यहाँ,
माँ तेरे दामन मैं खेल करती थी, और तू मेरे हर पल को रोशन करती थी..
उस रोशनी के नाम पे तूने, दामिनी नाम रखा था.......
पर वो काली रात थी माँ, जिसने इस रोशनी को बुझा दिया...
मेरे हर एक सपने और अरमान को, उन पापियों ने मिटा दिया...
द्वारा :- संदीप शरद
असिस्टेंट मैनेज़र (प्लानिंग - सिविल)
एरा ग्रुप (नॉएडा)
बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर