Tuesday, 20 October 2015


 तेरे दरबार पे मैं आऊँगा माइयां। ... 


 दोस्ती थी, साथ था, ना जाने ये कैसा एक तरफ़ा प्यार था,
वो भी दिन था, जब मिले थे और माता रानी का दरबार था !
माना था हम जाएंगे साथ वहां, जहां मिले थे उस रात वहां,
पर वो सपने थे जो छूट गए, माता रानी आज हम फिर टूट गए
कोशिस की, बात भी की, पर उनका एहसास न हम जगा सके,
 मेरी किस्मत भी देखो मैया, दरबार पे दोबारा हम न आ सके
 मैया आज मैं कहता हूँ , ये प्यार व्यार सब झूठे हैं,
इन रिस्तो के नाते मैया, तुम भी मुझसे रूठी हो ,
आज पता हैं मुझको भी, मैंने माँगा था तुझसे
पर मैं न ये जान सका, की वह एक तरफ़ा प्यार ही था मुझसे
मइया मुझको माफ़ करना, मैं तेरे दर ना आ पाया,
अपनी इस झूठी चाहत के नाते, मैं तुझको ही फिर भूल गया ,
मैया ये मेरा वादा हैं, मैं आऊँगा तेरे दर पे वहाँ,
जो कस्मे खाई थी मैंने, आकर के तोड़ूंगा वहां,
 ये रिश्ते मुझको नहीं चाहिए , जो रातो दिन रुलाते हैं,
 मैंया तेरे दर से हम, आज खली हाथ ही जाते हैं,
तेरे दर पे आऊँगा मैया, दर्सन भी कर जाऊँगा मैया
माँगा था जो तुझसे मैंने, उसका भी हर्जाना दे जाऊँगा मैया,
पर मुझको एक बात बताना, अब मुझको मत यू फिर रुलाना !!

संदीप शरद

Friday, 5 June 2015

                              परिवर्तन 

दिल्ली, राजधानी दिल्ली, जगह हौज खाश मेट्रो
स्टेशन, रिंग रोड साइड जहाँ ओखला , कालका जी, गोविंदपुरी, नेहरू प्लेस इत्यादि महत्वपूर्ण स्थानो के लिए ऑटो रिक्शा मिलते हैं, सुबह ऑफिस का समय, भागदौड़ जिंदगी में हम भी मेट्रो से बाहर आये रोजाना की तरह, हमने भी लोगो की तरह ऑटो बुलाना शुरू कर दिए, भाई साहब ! ओखला फेज १ चलेंगे, जवाब में , १२० रूपया, कोई कहता १३० रुपया, एक भाई साहब ने थोड़ा कम भाड़ा बोला १०० रुपया, पर हमारा एक ही जवाब था जितना भी बनता हैं हम मीटर से ही चलेंगे.... पर कोई ऑटो रिक्शा तैयार न हुआ। । हम भी काफी देर तक कोशिस करते रहे तभी हमारी निगाह एक ट्रैफिक पुलिस वाले पर गईं. वो किसी ऑटो वाले से कुछ बोल रहा था, तभी मैं भी वहां पंहुचा तो जो मैंने देखा वाकई देखता ही रह गया। … पहली दफा थी की कोई पुलिस वाला, चाहे वो ऑटो वाला हो या हम जैसा कोई आम नागरिक , बहुत ही तहजीब से बाते कर रहा था, एक बार तो ऐसा लगा की ऐसे पुलिस वाले अगर हमारे यहाँ हो तो शायद जो पुलिस के पास जाने में डरते हैं वो कभी नहीं डरेंगे और ऐसा लग रहा था मानो की हमारा कोई दोस्त हो.... पुलिस वाला उस ऑटो वाले से ये कह रहा था की तुम्हारे मीटर में सरकार ने अतरिक्त पैसे के साथ मीटर फिक्स किआ हैं तो आप बिना मीटर के क्यों चला रहे हैं। … आप की वजह से ये आम आदमी धूप में खड़े हैं एक आश के साथ की कोई तो चलेगा। । अब आप हमारी मदद नहीं करेंगे तो आप सरकार से क्या उम्मीद करेंगे। . मतलब साफ़ था हम आपस में एक दूसरे की मदद करे बिना किसी फायदे के... और हमारे देखते ही देखते वो ऑटो वाला उस पुलिस वाले के पैरो पर जा गिरा और बोला साहब माफ़ करना गलती हो गई , उस पुलिस वाले ने बोला, सब ऊपर वाला हैं वहीँ देखता हैं हम अपना काम ईमानदारी से करते रहे जैसे केजरीवाल साहब करते हैं। ……
मैं ये देख कर वाकई मैं अचम्भे में पड़ गया की अब तो कोई चुनाव माहौल भी नहीं हैं फिर भी ये केजरीवाल साहब का नाम ले रहा हैं। … फिर क्या था हमने भी अपनी पड़ताल शुरू कर दी और करीब 12 लोगो से पूछा तो उनका जो जवाब वाकई दिल छू लेने वाला था , की ये एक पुलिस वाला नहीं यहाँ हर पुलिस वाला ऐसा ही हैं जबसे केजरीवाल साहब आये हैं। …
ये सब सुनाने और देखने के बाद हम यहीं सोचते हैं अच्छे लोगो को मीडिया हमारे बीच क्यों नहीं लाती हैं। ., हम किसी का समर्थन नहीं करते हैं हमें तो राजनीती का अ भी नहीं आता, पर हाँ अगर किसी के नाम पर कोई अच्छा काम करने लगता हैं तो वाकई में वो बहुत महान हैं। … हम यहीं आशा करेंगे अगर आज २-४ लोग बदले हैं तो उम्मीद हैं ५ साल बाद सारा दिल्ली बदलेगा। …। !!

संदीप शरद

Thursday, 1 January 2015

"गजल" ही थी तेरे नाम की जो मैं लिखता रहा  !!




एक खामोश हैं गजल, वो लफ्ज कह रहे हैं,
ज़िंदा हैं तेरे याद में, वो शब्द कह रहे हैं, 
मरता नहीं हैं कोई, किसी याद के लिए,
जीता हैं वो यहाँ, किसी साथ के लिए,
चले थे दो कदम तो मुलाकात हो गई,
पीछे देखा हमने तो बरसात हो गई,
नम हुए ये आशू, एक प्यार के लिए,
ज़िंदा हूँ यहाँ बस तेरे साथ के लिए,
वो लफ्ज थे मिले, कुछ याद लिख दिआ,
तेरे नाम पे आज फिर एक साज लिख दीआ,
वो साज था पुराना एक राज के लिए,
उस राज के नाम पे एक गजल लिख दीआ,
उस गजल में तेरे नाम को, जब खोजने चला,
दूर तलक जाकर मैं फिर रुक गया,
मैं सोचता रहा और जगता रहा,
वो "गजल" ही थी तेरे नाम की जो मैं लिखता रहा ....   

  द्वारा :- संदीप शरद
    बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर