Tuesday, 20 October 2015


 तेरे दरबार पे मैं आऊँगा माइयां। ... 


 दोस्ती थी, साथ था, ना जाने ये कैसा एक तरफ़ा प्यार था,
वो भी दिन था, जब मिले थे और माता रानी का दरबार था !
माना था हम जाएंगे साथ वहां, जहां मिले थे उस रात वहां,
पर वो सपने थे जो छूट गए, माता रानी आज हम फिर टूट गए
कोशिस की, बात भी की, पर उनका एहसास न हम जगा सके,
 मेरी किस्मत भी देखो मैया, दरबार पे दोबारा हम न आ सके
 मैया आज मैं कहता हूँ , ये प्यार व्यार सब झूठे हैं,
इन रिस्तो के नाते मैया, तुम भी मुझसे रूठी हो ,
आज पता हैं मुझको भी, मैंने माँगा था तुझसे
पर मैं न ये जान सका, की वह एक तरफ़ा प्यार ही था मुझसे
मइया मुझको माफ़ करना, मैं तेरे दर ना आ पाया,
अपनी इस झूठी चाहत के नाते, मैं तुझको ही फिर भूल गया ,
मैया ये मेरा वादा हैं, मैं आऊँगा तेरे दर पे वहाँ,
जो कस्मे खाई थी मैंने, आकर के तोड़ूंगा वहां,
 ये रिश्ते मुझको नहीं चाहिए , जो रातो दिन रुलाते हैं,
 मैंया तेरे दर से हम, आज खली हाथ ही जाते हैं,
तेरे दर पे आऊँगा मैया, दर्सन भी कर जाऊँगा मैया
माँगा था जो तुझसे मैंने, उसका भी हर्जाना दे जाऊँगा मैया,
पर मुझको एक बात बताना, अब मुझको मत यू फिर रुलाना !!

संदीप शरद

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