एक अंजान लडकी से किसी मोड़ पर मुलाक़ात हो गई,
देखते ही देखते वो मेरे साथ हो गई,
जिंदगी की आस मैं बैठा हुआ था मैं,
और उसकी याद में , कुछ लिख रहा था मैं,
शायद खुशनसीब था , और चल पढ़ा था यूँ,
दर्शन माँ के कर चुका था यूँ ,
मुझको न पता क्या हो रहा हैं ये, बस जिंदगी की आस मैं जी रहा था मैं,
जब माँ के दर्शन हुए तो खुशनसीब था, जिंदगी का साथ शायद अब मुझको नसीब था,
चल पड़ी वो मेरे साथ ऐसे मानकर , मान लो उसे जैसे माँ का आशीर्वाद जानकर!
पहुचे था कटरा, और यादों का झुण्ड था,
बस इन्ही यादों में उसीका नूर था!
जिंदगी फिर चल पड़ी , जैसे की कोई मिल गया,
उसकी याद में मेरा दिल फिर खिल गया,
मासूम सा चेहरा , मुझको तो याद हैं,
मेरा वो साथ, क्या उसको याद हैं?,
जम्मू से यादें लिए ,मैं फिर चल पड़ा,ऐसा ही प्यार शायद मुझको नसीब था,
.....ये मेरे जज्बात थे जो मैंने पिरो दिए,
और उसके जज्बात मुझको न मालूम था,
की उसके दिल में क्या मेरा ही प्यार था?;
चल पड़ा फिर घर की ओर मै.........
यादों को अपने सीने दफ़न करता चला गया,
क्योकि प्यार और मोहब्बत देख चुका था मैं,
और जिंदगी से आगे निकल चुका था मैं,
प्यार पर मुझको अब बिल्कुल न यकीन था..,
था तो भरोसा , वो दोस्ती प्यार का,
ऐसी मिली वो दोस्ती, जैसे वरसों का प्यार था,
बदली ये दोस्ती , जैसे मोहब्बत के रंग में,
और हार गई आज, इस प्यार के जुंग में!,
ऐसा ही प्यार शायद मुझको नसीब था,
पर मुझको न मालूम , क्या ये प्यार उसको कबूल था,
बस ऐसी ही कहानी को मैंने संजों दिया,
प्यार और मोहब्बत के शब्दों को आज दिल से पिरो दिया................!!
द्वारा:- संदीप शरद
सेनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल) बी.टेक. :- अच्. बी. टी. आई. कानपूर
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