कलम उठाया, बात उठाई, लिख डाला नए जज्बात यहाँ!
प्यार को समझा, नफ़रत समझी, न समझा इंसान यहाँ!!
रात को तन्हा, दिन में तन्हा, लिख डाला जज्बात यहाँ!
दुनियां की ताकत को समझा, अपने को कमजोर यहाँ!!
दुनियां देखा, रब को देखा, न आया कुछ फर्क यहाँ!
नेता देखा, अभिनेता देखा, देखा तो भ्रस्टाचार यहाँ!!
भारत रोया , जनता रोई, नाम यहाँ सामान हैं,
ये गरीब को कुचला करते हैं, ये भारत का अपमान हैं!,
इतिहाश के पन्ने को पलटा, तब आया एक ख्वाब यहाँ,
भारत अपना था, अब मानो गुमनाम यहाँ,
हर लम्हा सोचा करते थे, जीना कितना आसान यहाँ,
जब जीने की राह में पहुचे, तब आया कुछ याद यहाँ,
याद वो लम्हा करते थे, और चुपके - चुपके रोते थे,
दिन को तो हम हस्ते थे और रात को तन्हा होते थे,
ऐसे ही जज्बात को हमने , बना डाला हैं धार यहाँ,
अब भारत की रक्षा करने के खातिर, आज निकाली तलवार यहाँ......!!!
द्वारा :- संदीप शरद,
Seniour : प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
बी.टेक.:- अच्.बी.टी.आई. कानपूर
No comments:
Post a Comment