Monday, 9 April 2012

मैं तो इन्सान था, न जाने कहाँ खो गया हूँ...!!!!!

मैं इन्सान हूँ, प्यार को खोजता हूँ,
न जाने मेरा प्यार कहाँ  खो गया हैं ?
यहीं दुःख हैं यहीं पहचान हैं मेरी,
मैं तो इन्सान था, न जाने कहाँ खो गया हूँ?
अच्छा था जब प्यार न था मेरे जीवन में
आज तो मेरा सारा जीवन गम से भर गया हैं,
साथ देने को कहा था, मेरे जीवन के हर मोड़ तक
न जाने वो साथ कहाँ छूट गया हैं .......
उमर न थी मेरे प्यार करने की, पर वो ताउम्र हो गया हूँ
चला तो था दो कदम मैं भी, आज बेकदम हो गया हूँ,
कसमें खाई थी साथ जीने और मरने की
न जाने वो कहा खो गया हैं.....?
रास्ता था सीधा, और मैं भी चल पड़ा था
न जाने ये मोड़ कहा से आ गया हैं....?
साथ छुटा हमारा इस कदर , जैसे हम नदी के  दो किनारे बन गए हैं,
फिर भी हमने किनारों को मिलाना चाहा, लेकिन हम फिर किनारे हो गए हैं ....
हम तो इन्सान थे बस आज गम के हो गए हैं.
यहीं दुःख हैं यहीं पहचान हैं मेरी,
मगर उस परछाई मे , मैं भी बहकर खो गया हूँ....
ये नाम न  था किसी और का, ये "शरद" हैं जो कहीं खो गया हैं ...................................!!!!!

                                                                                  द्वारा :- संदीप शरद
                                                                                  सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
                                                                             बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर

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