Monday, 21 May 2012

चुपके चुपके हँसता हूँ, मैं चुपके हँसता हूँ........@@!!!




ये प्यार मोहब्बत क्या होता, अल्फाज जमाना क्या कहता,
अरमान को लेकर फिरते हैं , ये कफ़न जमाना क्या कहता - 2 !
कुछ प्यार को लेकर फिरते हैं, कुछ नाम को लेकर फिरते हैं,
इंसानों की इस दुनियां में, कुछ अरमान को लेकर फिरते हैं !
आज उसी अरमानो की मैं साँज यहाँ सुनाता हूँ,
कुछ नहीं बनता यहाँ , फिर भी अंजान  सा रिश्ता बनाता हूँ !

एक राज सुनाता हूँ, कुछ बात सुनाता हूँ,
वो बात पुरानी थी, आज कुछ नई सुनाता हूँ !
अनजान थी वो मुझसे, अनजान था मैं उससे,
देखा जब मैंने, मानो पारी हो वो जैसे !
परियों की सहजादी , धरती पर आई थी,
चन्द पल ठहरी , पर खुशियाँ वो लाई थी !
उन खुशिओं ने मुझको , एक राज बताया था,
देख ले तू ये सपना , एक अरमान जगाया था !
दिन में तो हम हसते थे और रात में तनहा होते थे,
अरमान भी मेरे ऐसे थे, जो चुपके - चुपके रोते थे !
उस परिओं की सहजादी ने, मुझको खूब हँसाया था,
तब तनहा जब मैं रहता था, तो हँसता फिर मैं रहता था !
ऐसे ही अरमानो को, जब याद मैं करता हूँ,
तब दिल की बात करें मेरे दोस्त, मैं चुपके - चुपके हँसता हूँ ......और चुपके - चुपके हँसता हूँ....!

                                                                             द्वारा :- संदीप शरद
                                                                            सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)

                                                                             बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर

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