Tuesday, 3 April 2012

फर्क बस इतना हैं..........कि तू हैं वहां और मैं हूँ यहाँ.......!!!!!!!.....


मेरे गम को, मेरी बेवसी को, न कोई समझा यहाँ
बस आग बुझाने को चले आते हैं यहाँ,
पैदा किया मुझको भी, उसको भी एक माँ ने यहाँ
फर्क बस इतना हैं, मैं हूँ यहाँ और वो हैं वहां,
किसी का शौक नहीं बनता, किसीका बिस्तर बनना
वो तो गरीबी हैं, जो इन्सान को बिस्तर तक ले आती हैं यहाँ,
ये तो बिस्तर पर, हमबिस्तर बन जाते हैं यहाँ
मगर इन्हें बनाने वाले, अक्सर गुमनाम हो जाते हैं यहाँ,
कभी सोचा नहीं, कि इन्हें बनाया किसने
बनाने वाले, तो अक्सर एक राज बन जाते हैं यहाँ,
राज भी ऐसे होते हैं, जो गुमनाम होते हैं यहाँ
बेक़सूर ही, कसूरवार बन जाते हैं यहाँ,
लोग सोचते हैं, देखते हैं, बदनाम नजरो से यहाँ
पर वो जानते नहीं, कि इनकी जिंदगी भी कितनी गुमनाम हैं यहाँ,
हर रोज आते हैं, लोग अपनी प्यास बुझाने को यहाँ
पर वो शायद जानते नहीं, वो भी किस माँ कि बेटी हैं यहाँ,
फर्क बस इतना हैं..........कि तू हैं वहां और मैं हूँ यहाँ.......!!!!!!!.....:(

                                                                                  द्वारा :- संदीप शरद
                                                                                  सीनिओर प्लानिंग इंजिनियर (सिविल)
                                                                             बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर

2 comments:

  1. what is your target in this poem?
    i may be correct but kafi dil se likha hai..
    good work..

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  2. Dear Sanju, However I am not recognizing u ..but doesn't matter dude, dis is blog, & however i think that everyone can give our nice opinion which will be better than my thoughts, & yes also i believe in public opinion cos i only write poem & Novels, but All my poem & novels will be famous by all my public friends...& Yes Sanju whenever I write poem or Novels then i don't believe in target, Whatever i see in this world with respect to public (All Guys ), I write only from my hearts, Yes Sanju if u wanna correct then sure welcome.

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