Thursday, 10 April 2014


आज मैं टूटे ख्वाब को, हकीकत में बयां करने चला !
ना था कोई मेरे साथ, और आज फिर अकेला ही चला !!
ये मतलबी दुनियां हैं मेरे दोस्त, यहाँ कोई हमसफ़र नहीं हैं !
जो हमसफ़र था मेरे साथ, वो भी साथ छोड़ चला !!
चला फिर दो कदम, करावैं मंजिल की तरफ !
देखा तो वहां, एक ख्वाब सा जगा !!
सोचा भी न, समझा भी ना, चल पड़ा उस अनजान मंजिल की तरफ !
ढूढता रहा, सपनो को उस हकीकत तक, जो अपना कभी था ही नहीं !!
मैं उस अनजान मंजिल को, उस अनजान राहों को, तलाशता हूँ आज भी !
पर न जाने उन ख्वाबों, में "शरद" कहा खो गया !!....

                                                                                   द्वारा :- संदीप शरद
                                                                                   बी . टेक . :- अच्. बी. टी. आई. - कानपूर

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